Tuesday, 15 October 2024

सुनो चाय पिओगी ?

 सुनो,

चाय पिओगी...

चलकर कहीं किसी पेड़ के नीचे,

सड़क किनारे, शहर से दूर

जहाँ तक पहूंचा ना हो,

यह आधुनिक होने का मीठा ज़हर

जहाँ पेड़ पर कोयल की कू-कू हो,

जिसकी छांव में चिड़िया की चं चं हो


वहीं बैठकर सुलझा लें,

अपने सारे मसले,

कि क्यों तड़पता है यह दिल तुम्हें पाने को,

वहीं खोज लेंगें इस सवाल का जवाब

कि क्यों घबराता है यह दिल तुम्हें खोने से,

शायद मिल जायें,

तुम्हारे सवालों के जवाब भी वहीं,

सुनो,

चाय पिओगी.. 

साथ चलकर मेरे.... 


- हिमांशु विद्रोही

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