Tuesday, 15 October 2024

माथे पर बोसा

मेरे दायें हाथ में तुम्हारा बायां हाथ

और मेरा बाया हाथ तुम्हारी कमर पर 

इस तरह कसा हो कि 

कसकर खींच सके तुम्हें इतना करीब कि

तुम्हारी गर्म सांसों का अहसास मेरी गर्म सांसों को हो

इतने करीब कि

मेरे दिल में धड़कता तुम्हारा नाम तुम्हारे दिल को सुनाई दे


उस क्षण मैं पितृसत्ता की इन बेड़ियों को तोड़कर

जिसने बांधा सदैव तुम्हारे ख्यालों को एक जंजीर से

तोड़कर उस जंजीर को

भूलकर तमाम जहाँ के रीति रिवाज और

तोड़कर समाज की अनेकों बंदिशें

जातिवाद की छाती पर रखकर पैर

चीरकर सीना मजहबी पाखंड का

कुचलकर संस्कृति रक्षक सांपों को

तुम मुझे स्वीकार करो और

मैं तुम्हें माथे पर बोसा दूं !


- हिमांशु विद्रोही 

चल आ शराब पीते हैं दोनों भाई

 वो जो चला गया

जा चुका है, जाने दे

चल छोड़, आ शराब पीते हैं दोनों भाई

जा चुका ना, जाने दे !


तो क्या हुआ 

कि एक लहजा था

और लहजे पर तुम मरते थे

वो‌ लहजा... 

लहजा ही तो था

जाने दे ! 


तो क्या हुआ

कि उसने पूछा था मोहब्बत है ?

और तुम झुमके खरीद लाये थे

झुमका...

झुमका ही तो था जाने दे ! 


तो क्या है 

कि एक वो आंखें थी

आंखें...

जिन्हें तुम उदास नहीं देख सकते थे

आंखें...

आंखें हीं तो थी जाने दे ! 


और क्या हुआ 

कि एक वो लब थे

लब...

जिन्हें तुम खामोश नहीं देख पाते थे

लब...

लब ही तो थे

जाने दे ! 


तो क्या हुआ कि एक वो कंगन थे

कंगन, 

कंगन जिनकी आवाज़ तुम सबसे खामोश हो सुनते थे

कंगन... 

कंगन ही तो थे, जाने दे ! 


वो‌ जा चुका ना, जाने दे, 

चला गया है, जाने दे

चल आ शराब पीते हैं दोनों भाई

जा चुका ना ? जाने दे !

सुनो चाय पिओगी ?

 सुनो,

चाय पिओगी...

चलकर कहीं किसी पेड़ के नीचे,

सड़क किनारे, शहर से दूर

जहाँ तक पहूंचा ना हो,

यह आधुनिक होने का मीठा ज़हर

जहाँ पेड़ पर कोयल की कू-कू हो,

जिसकी छांव में चिड़िया की चं चं हो


वहीं बैठकर सुलझा लें,

अपने सारे मसले,

कि क्यों तड़पता है यह दिल तुम्हें पाने को,

वहीं खोज लेंगें इस सवाल का जवाब

कि क्यों घबराता है यह दिल तुम्हें खोने से,

शायद मिल जायें,

तुम्हारे सवालों के जवाब भी वहीं,

सुनो,

चाय पिओगी.. 

साथ चलकर मेरे.... 


- हिमांशु विद्रोही

पांचवे साल की आखिरी बारिश

देख बारिश रूक गई

बारिश आने दे

वो आयेगा

उसने बारिश में आने का वादा किया था

संग भीग जाने का वादा किया था

भीगकर संग गर्म चाय पीने का वादा किया था

वो आयेगा

ज़रा बारिश तो आने दे

देख ना वो बारिश रूक गई

तो क्या हुआ

यह पांचवे साल की आखिरी बारिश थी ।


- हिमांशु विद्रोही

लुटते हिंदुस्तान की आबरू

 हे ! प्रेमिकाओं को पत्र लिखने वाले प्रेमियों

इश्क़ पर गज़लें लिखने वाले आशिकों

श्रृंगार पर कविता लिखने वाले कवियों

सुनो...

तोड़ दो अपनी कलम और

फाड़ दो कोरा कागज 

तुम्हारी स्याही बांझ हो जाये

जो एक शब्द भी पैदा ना कर पाये


अगर लिख नहीं सकते तुम

संसद के सामने लुटती बहनों की इज्जत

लोकतंत्र के मंदिर में लोक पर भारी तंत्र

बेआबरू हो चुकी सत्ता की तानाशाही

बिक चुकी मिडिया का ज़हर

गंगा में फेंकें जा रहे मेडल

जलते हुए रोम में बांसुरी बजाते निरो

की लापरवाही, बेहयाई और

लुटते हिंदुस्तान की आबरू


हे ! प्रेमिकाओं को प्रेम पत्र लिखने वाले प्रेमियों

तुम्हें मोहब्बत लफ्ज़ लिखने का कोई अधिकार नहीं 

तोड़ डालो अपनी कलम और 

फाड़कर अपनी डायरी के पन्ने

जाओ जाकर अल्लाह और राम का जाप करो 


- हिमांशु विद्रोही

तेरा मेरा हिंदुस्तान

 आ एक नया मुल्क तामीर करें जिसमें


थोड़ा हिंदू, थोड़ा मुसलमान हो

सिख, इसाई और बौद्ध भी हों

सर्वोपरि बस इंसान हो !


तेरा थोड़ा भारत, मेरा थोड़ा पाकिस्तान हो

टूटे शरहद, मिटें दूरियाँ, दिलों में सबके प्यार हो

थोड़ा तेरा थोड़ा मेरा, मुक्कमल हिंदुस्तान हो !


थोड़ा मेरा लाहौर, तेरी भी थोड़ी दिल्ली हो

तुम आओ जयपुर कभी, मेरी थी थोड़ी कराची हो

थोड़ी मेरी रावलपिंडी, तेरा भी थोड़ा अहमदाबाद हो

तु भी घुमे लखनऊ, मेरा भी थोड़ा इस्लामाबाद हो

पटना तेरा, रांची तेरी, तेरा जैसलमेर हो,

गुड़गांव तेरा, अंबाला तेरा, तेरा भी हैदराबाद हो

मैं भी घुमूं‌ मुलतान, देखूँ मैं पेशावर,

क्वेटा देखूँ, देखूँ गुजरेंवाला, मेरा भी फैसलाबाद हो

टूटे शरहद, मिटें दूरियाँ, दिलों में सबके प्यार हो

थोड़ा तेरा थोड़ा मेरा, मुक्कमल हिंदुस्तान हो !


मुझे मिले सरगोधा में बैठी मेरी मोहब्बत

तुझे भी तेरा अमृतसर वाला प्यार मिले

आ एक नया मुल्क तामीर करें ।


-  हिमांशु विद्रोही 

Thursday, 15 June 2023

ख्वाब लिखे थे, याद लिखी थी

एक रोज गया था मैं

कंही दूर,

वहां

पहाड़ों के बीच

घने जंगल में बहती

कलकल करती, शोर मचाती

नदी किनारे

एक पत्थर पर 


छाँव से ढंकीं जमीन पर

डूबते सूरज की लालिमा से 

निकलकर आ रही एक किरण

टकराकर लौटती एक पत्थर से

उस पत्थर पर 


पंछियों के घोसले में लौटने 

घोंसलों में इंतज़ार करते बच्चों

कौवे की कांव-कांव, चिड़ियों की चहचहाट

और कोयल की कूक

गूंजकर पहाड़ों में

आ टकराती है जिस पत्थर से

उस पत्थर पर 


उस पत्थर पर बैठकर मैंने लिखना चाहा,

लिखूं जंगल की तमाम बातें 

नदी का शोर लिखूं या कौवे की कांव लिखूं

चिड़ियाँ की चें- चें या कोयल की कूक लिखूं 


लिखूं डूबते सूरज की लालिमा 

जंगल का शांत स्वभाव लिखूं 

आती काली रत लिखूं 

कौवे का चुप हो जाना लिखूं 

या चिड़ियों का सो जाना लिखूं

कैसे इस रात की मैं बात लिखूं 


चमकते चाँद की दूधिया रोशनी लिखूं 

या तारों की छाँव लिखूं

टिमटिमाते जुगनूं , सियारों की चिंघाड़ लिखूं 

या भंवरों का गीत लिखूं 


ख्वाब लिखूं या ये रात लिखूं 

याद जो मुझे, वो हर एक बात लिखूं 


यही सोचते भौर हुई 

जाने कहाँ वो रात गई

ना कलम उठी, ना डायरी खुली 

एक भी ना बात लिखी 


मैं लौट आया और वो बात गई 

रात गई कर कई साल गई। 


एक रोज मुझे वो डायरी दिखी 

मुद्दत बाद वो डायरी खुली। 


डायरी में वो रात लिखी थी 

उस रात की हर एक बात लिखी थी 

चैन लिखा था, नींद लिखी थी 

ख्वाब लिखे थे, याद लिखी थी 


अलगाव लिखा था, मुलाकात लिखी थी 

गर्मी की ठंडक और सर्दी की ताप लिखी थी 

और वो पहली पहली बरसात लिखी थी। 


गम लिखा था, खुशियां लिखी थी 

मिलन लिखा था, जुदाई लिखी थी 

चाँद लिखा था, चांदनी लिखी थी 

इश्क़ लिखा था, दीवानगी लिखी थी 


भूत लिखा था, वर्तमान लिखा था 

आज लिखा था, कल लिखा था 

सारा का सारा जीवनकाल लिखा था 

'विद्रोही' का हर एक ख्वाब लिखा था ।


जीवन का मेरे सारा सार लिखा था

मेरा सारा का सारा संसार लिखा था

हर पन्ना खाली था और 

हर पन्ने पर बस  "तुम्हारा नाम" लिखा था ।

- हिमांशु विद्रोही 

माथे पर बोसा

मेरे दायें हाथ में तुम्हारा बायां हाथ और मेरा बाया हाथ तुम्हारी कमर पर  इस तरह कसा हो कि  कसकर खींच सके तुम्हें इतना करीब कि तुम्हारी गर्म स...