एक रोज गया था मैं
कंही दूर,
वहां
पहाड़ों के बीच
घने जंगल में बहती
कलकल करती, शोर मचाती
नदी किनारे
एक पत्थर पर
छाँव से ढंकीं जमीन पर
डूबते सूरज की लालिमा से
निकलकर आ रही एक किरण
टकराकर लौटती एक पत्थर से
उस पत्थर पर
पंछियों के घोसले में लौटने
घोंसलों में इंतज़ार करते बच्चों
कौवे की कांव-कांव, चिड़ियों की चहचहाट
और कोयल की कूक
गूंजकर पहाड़ों में
आ टकराती है जिस पत्थर से
उस पत्थर पर
उस पत्थर पर बैठकर मैंने लिखना चाहा,
लिखूं जंगल की तमाम बातें
नदी का शोर लिखूं या कौवे की कांव लिखूं
चिड़ियाँ की चें- चें या कोयल की कूक लिखूं
लिखूं डूबते सूरज की लालिमा
जंगल का शांत स्वभाव लिखूं
आती काली रत लिखूं
कौवे का चुप हो जाना लिखूं
या चिड़ियों का सो जाना लिखूं
कैसे इस रात की मैं बात लिखूं
चमकते चाँद की दूधिया रोशनी लिखूं
या तारों की छाँव लिखूं
टिमटिमाते जुगनूं , सियारों की चिंघाड़ लिखूं
या भंवरों का गीत लिखूं
ख्वाब लिखूं या ये रात लिखूं
याद जो मुझे, वो हर एक बात लिखूं
यही सोचते भौर हुई
जाने कहाँ वो रात गई
ना कलम उठी, ना डायरी खुली
एक भी ना बात लिखी
मैं लौट आया और वो बात गई
रात गई कर कई साल गई।
एक रोज मुझे वो डायरी दिखी
मुद्दत बाद वो डायरी खुली।
डायरी में वो रात लिखी थी
उस रात की हर एक बात लिखी थी
चैन लिखा था, नींद लिखी थी
ख्वाब लिखे थे, याद लिखी थी
अलगाव लिखा था, मुलाकात लिखी थी
गर्मी की ठंडक और सर्दी की ताप लिखी थी
और वो पहली पहली बरसात लिखी थी।
गम लिखा था, खुशियां लिखी थी
मिलन लिखा था, जुदाई लिखी थी
चाँद लिखा था, चांदनी लिखी थी
इश्क़ लिखा था, दीवानगी लिखी थी
भूत लिखा था, वर्तमान लिखा था
आज लिखा था, कल लिखा था
सारा का सारा जीवनकाल लिखा था
'विद्रोही' का हर एक ख्वाब लिखा था ।
जीवन का मेरे सारा सार लिखा था
मेरा सारा का सारा संसार लिखा था
हर पन्ना खाली था और
हर पन्ने पर बस "तुम्हारा नाम" लिखा था ।
- हिमांशु विद्रोही
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