Friday, 12 May 2023

शहर मुझे अब यह वीरान लग रहा है


जाने कैसा बिछड़ा है वह मुझसे

मुझे तो यह कोई डरावना ख़्वाब लग रहा है


महज एक उसके चले जाने से 

हर अपना मुझे अब ग़ैर लग रहा है


पहचानती थी जिसकी हर गली मुझे मेरी आहट से

बगैर एक उस शख्स के शहर मुझे अब यह वीरान लग रहा है


जिसकी छाँव में बैठकर करता तो वो बातें

उस दरख़्त का साया भी मुझे अब धूप लग रहा है


जाने कैसी मिठास थी उसकी बातों में

इस 'विद्रोही' को  मधु भी अब ज़हर लग रहा है 


-हिमांशु विद्रोही 

 





1 comment:

  1. बहुत सुंदर।।।।अति उत्तम

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