जाने कैसा बिछड़ा है वह मुझसे
मुझे तो यह कोई डरावना ख़्वाब लग रहा है
महज एक उसके चले जाने से
हर अपना मुझे अब ग़ैर लग रहा है
पहचानती थी जिसकी हर गली मुझे मेरी आहट से
बगैर एक उस शख्स के शहर मुझे अब यह वीरान लग रहा है
जिसकी छाँव में बैठकर करता तो वो बातें
उस दरख़्त का साया भी मुझे अब धूप लग रहा है
जाने कैसी मिठास थी उसकी बातों में
इस 'विद्रोही' को मधु भी अब ज़हर लग रहा है
-हिमांशु विद्रोही
बहुत सुंदर।।।।अति उत्तम
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