Tuesday, 15 October 2024

माथे पर बोसा

मेरे दायें हाथ में तुम्हारा बायां हाथ

और मेरा बाया हाथ तुम्हारी कमर पर 

इस तरह कसा हो कि 

कसकर खींच सके तुम्हें इतना करीब कि

तुम्हारी गर्म सांसों का अहसास मेरी गर्म सांसों को हो

इतने करीब कि

मेरे दिल में धड़कता तुम्हारा नाम तुम्हारे दिल को सुनाई दे


उस क्षण मैं पितृसत्ता की इन बेड़ियों को तोड़कर

जिसने बांधा सदैव तुम्हारे ख्यालों को एक जंजीर से

तोड़कर उस जंजीर को

भूलकर तमाम जहाँ के रीति रिवाज और

तोड़कर समाज की अनेकों बंदिशें

जातिवाद की छाती पर रखकर पैर

चीरकर सीना मजहबी पाखंड का

कुचलकर संस्कृति रक्षक सांपों को

तुम मुझे स्वीकार करो और

मैं तुम्हें माथे पर बोसा दूं !


- हिमांशु विद्रोही 

1 comment:

  1. अर्मिता सिंह सूर्यवंशी4 August 2025 at 12:52

    वाकई काबिल ऐ तारीफ भाईजी 👌👌...🙏

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माथे पर बोसा

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