मेरे दायें हाथ में तुम्हारा बायां हाथ
और मेरा बाया हाथ तुम्हारी कमर पर
इस तरह कसा हो कि
कसकर खींच सके तुम्हें इतना करीब कि
तुम्हारी गर्म सांसों का अहसास मेरी गर्म सांसों को हो
इतने करीब कि
मेरे दिल में धड़कता तुम्हारा नाम तुम्हारे दिल को सुनाई दे
उस क्षण मैं पितृसत्ता की इन बेड़ियों को तोड़कर
जिसने बांधा सदैव तुम्हारे ख्यालों को एक जंजीर से
तोड़कर उस जंजीर को
भूलकर तमाम जहाँ के रीति रिवाज और
तोड़कर समाज की अनेकों बंदिशें
जातिवाद की छाती पर रखकर पैर
चीरकर सीना मजहबी पाखंड का
कुचलकर संस्कृति रक्षक सांपों को
तुम मुझे स्वीकार करो और
मैं तुम्हें माथे पर बोसा दूं !
- हिमांशु विद्रोही
वाकई काबिल ऐ तारीफ भाईजी 👌👌...🙏
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