Sunday, 25 September 2016

हम फिर से आवारा , पर मस्त हो गए हैं ।

 

                      हम फिर से आवारा , पर मस्त हो गए हैं ।    

                               
                                           
   देखा उन्हें तो लगा चाँद धरती पर उतर आया है...................


           जब जुल्फें हटी और नज़रें उठीं, देखा हमने उन्हें और नज़रे. मिली
   
                    मिली जब नज़र से नज़र,  तो कुछ नज़र  न आया
                 
              था जाने ऐसा क्या उन नज़रों में , जो नज़र को कुछ नज़र न आया

 और....       नज़र को जो नज़र आया , किसी को वो नज़र न आया ।

               

    जानते थे हम कि हम आवारा हैं , पर मस्त हैं......................

             
                               पर दिल था कि मानता न था !

            चाहा था हमने उन्हें दिल और जान से, चाहते थे पाना उन्हें सिद्दत से ।

                        और वो थे की न जाने कहाँ खो गए थे ...........!

     हर गली ,हर मोड़ पर उन्हें खोज था ,हर इंसान ,पेड़ पौधों तक से हमने पूछा था ।

                        न आँखों में नींद थी न दिल में सूकून

                        न दिन में चैन था , न रातों में  नींद

            न जाने हुआ था क्या .....? मन भी जाने क्यूँ बेचैन  था  !

                        तरसती थी ऑंखें , रोता था दिल ।

            थे हजारों लब्ज जुबां पे और कहने को कुछ आतुर थे लब ।

              थे ख्वाब हजारों और कान भी कुछ सुनना चाहते थे ।

                    और वो थे की न जाने कहाँ खो गए थे ...........!

         इस बीच जाने हुआ था क्या हमें , हम आवारा थे पर अब बदल गए थे ।

                  जानते न थे कि मंदिर और खुदा क्या है

                      अब हर रोज़ मन्नतें मांगते थे 

         हे खुदा मिला दे उनसे , वो मिलें तो दिल का हाल बता दें 

         अब ऑंखें तरस गयी हैं , अब और न होता इंतजार । 
             हे खुदा अब तो उनका दिदार करा दे  ! 

एक दिन जब देखा उन्हें......................
                      एक दिन जब  देखा उन्हें, तो साथ में कोई और भी था  !!!
                              
               मिलीं  थी नज़र से नज़र और जुल्फों में हाथ था ।  

खेल रही थी वो किसी की बाँहों में.....................

                               बस हम ही जानते हैं उस वक़्त दिल का हमारे क्या हाल था !!!


                   पहले देखा था तो लगा था जन्नत यंहीं है और यंहीं खुदा है ।  

  अब देखा तो लगा केवल भ्रम है दुनिया का, न कोई खुदा यंहाँ और न कोई जन्नत ।  

                     हम फिर से आवारा , पर मस्त हो गए हैं । 




                                                               - हिमांशु विद्रोही 

4 comments:

  1. उम्दा कविता | प्रेम से लरजती दिल की बैचनी और बहकती सासों का अंतहीन दौर को यह कविता रोमांटिक करता है, दिल की सुनसान राहों में किसी का मिलना और उससे फिर मोहभंग होना अवश्य दर्दभरा रहा, किन्तु इसी को प्रेम नाम दिया गया हैं,,,प्रेम वही बेहतर है जो हमेशा अधूरा रहे, पूर्ण प्रेम से बेहतर अधूरा प्रेम होता है| इसलिए कि पूर्ण प्रेम में प्रेम की तीव्रता कम हो जाती है, जिंदगी की परेशानियाँ प्रिय/प्रियतमा को प्रेम से इतर सोचने पर मजबूर कर देती है, जबकि अधूरा प्रेम अपनी टीस छोड़कर दर्दभरा सुख देकर हमेशा महकाती रहती है|

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  3. क्या तारीफ़ करूँ । तारीफ़ भी छोटा होगा इसके तारीफ़ में

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