Friday, 27 January 2017

यादें

मेरी यह  कविता, जो कि दुनिया के हर उस शख्स को समर्पित है जिसने मोहब्बत करने की जुर्रत की है और एक दिन उसे न पाकर  हर पल  किसी की यादों में बैचेन हो जाता है, जिसे कविता कहा गया तो शब्द बुरा मान जायेंगे , शब्दों का संगम कहा तो, भावनाएं  मान जायेंगी , भावनाएं कहा तो मोहब्बत  मान जायेगी, मोहब्बत कहा तो जज्बात बुरा मान जायेंगे और अगर जज्बात कहा तो हर वो शख्स बुरा मान जायेगा जिसे यह समर्पित है । अतः इसे कोई भी नाम न देते हुए  मैंने इसे लिखने की जुर्रत की है।               

                                                यादें 


 यादों में किसी कि क्यों तू बैचेन रहता है, कर याद उसे जो न हुआ तेरा !

                               क्यों तु इस कदर तन्हा रहता है। .....? 

    अब कर याद उस नजर को, जब नजर से नजर मिली थी । 
     जब खोया था तु  नज़रों में ,   कर याद उस नजर को ! 

                               क्यों तू बैचेन रहता है.......... ?

         अब कर याद उस लम्हे को, जिसमें कोई फूल खिला था।  
अब कर याद उस लम्हे को, जिसमें किसी की आवाज खनक उठी थी। 
अब कर याद उस लम्हे को, जिसमें किसी की नजरों के मोती बरसे थे।  
अब कर याद उस लम्हे को....... 

                             क्यों तु इस कदर तन्हा रहता है। .....?

सच तो यह है कि कसूर तेरा था......... !

चाँद को छूने की तमन्ना थी, चाहा था तूने आसमां को जमीं पर।  
सितारों को छूने की जिद्द थी , चाहा था तूने कि फूल खिलें पत्थरों पर। 
काटों में तुझे खुशबू की तलाश थी..........!

 यादों में किसी कि क्यों तू बैचेन रहता है, कर याद उसे जो न हुआ तेरा !

                               क्यों तु इस कदर तन्हा रहता है। .....?

                                                                                       - हिमांशु विद्रोही 

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