Wednesday, 21 February 2018

जश्न-ए-आज़ादी


जश्न-ए-आज़ादी
( विश्वविद्यालय स्तर पर प्रथम पुरुस्कार प्राप्त कविता )

कब बीते दिन, कब गुजरी रातें
कब गुजरे महीने, कब बीते साल |
हो गये 70 साल उस दिन को
जिस दिन हुए थे हम आज़ाद |

फुटेंगें पटाखे, बटेंगें बतासे
होगा जश्न, मनेंगीं खुशियां |
बजेंगें ढोल, बजेंगे ताशे
होगा मदरसों में भी राष्ट्रगान
हुकुमरान का ऐसा है फरमान |

मशगूल हैं सब मनाने में जश्न-ए-आज़ादी
मैंने सोचा मैं भी मना लूँ
पर कैसे ?
हां... कुछ लिख लेता हूँ
कुछ दोस्त कवी-कवी कहा करते हैं मुझ को भी |

पर लिखने का विषय क्या होगा ?
इस सवाल ने कलम रोक दी |

किसान”...
हां यह अच्छा विषय है और जवलंत भी

किसान तो आज़ाद है सन 1947 से ही
फिर क्यों जीवन भर गुलामी निभाता है किसान ?
दिन भर हल चलाता है किसान
फिर क्यों रात को भूखा ही सो जाता है किसान ?
जल उसका, जमीन उसकी
खेत उसका, खलिहान उसके
फिर क्यों आत्महत्या कर मर जाता है किसान ?

अब और नहीं लिख पाउँगा
मन विचलित हो चला, हाथ भी कांप गये
और मैंने विषय बदल डाला |


अब मैंने चुना महिला”...
देश की पहचान हैं महिला,
चाँद तक पहुंच गयी हैं महिला
फिर भी पुरुषों की गुलाम हैं महिला
सिनेमा में नग्नता एक पहचान है
फिर भी पर्दे में कैद है महिला |
इस देश  में देवी का दर्जा है महिला को
फिर भी बलात्कार की शिकार है महिला |


मैंने फिर विषय बदल डाला
                                                                             
अब मेरा विषय था छात्र”...
छात्रदेश का भविष्य
सबको है शिक्षा का अधिकार
फिर क्यों वंचित हैं छात्र शिक्षा से ?
देश का भविष्य है इन्हीं के हाथों में
फिर क्यों चाय के कप धो रहे हैं यह हाथ ?
लाखों का बजट है जब पारित
तो क्यों छोड़ पढाई मजदूरी कर रहा है छात्र ?
सबको है बराबरी का अधिकार
तो क्यों है जातिगत छुआछूत का शिकार छात्र ?

अब और नहीं सोच पाया
दिमाग सुन और आँखें नम
छोड़ कलम मैं भी चला आया
मनाने जश्न-ए-आज़ादी
होठों पर थी फिकी मुस्कान और मष्तिस्क में हजारों सवाल | 


- हिमांशु विद्रोही 

प्रकाशित: 'The Critical Mirror' 




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