Wednesday, 21 February 2018

'छोटू'


ढ़ाबे पर काम करते 'छोटू'से बातचीत...

 

'छोटू'

जूठा गिलास धोना बीच में छोड़,
ग्राहक की एक आवाज़ पर 
जाकर पहले गंदी प्लेटें उठाता हूँ |

प्लेट रखी नहीं कि कहीं से आवाज़ आती है,
अरे ! टेबल साफ़ करो....
नंगें पाँव दोड़कर,
टेबल पर घुमाता हूँ वही गंदा कपड़ा
जो पहले भी कई टेबलें साफ़ कर चूका है |

टेबल साफ़ कर सोचता हूँ
पानी पी लूँ, थोडा आराम भी कर लूँ |
पानी पिया नहीं कि मालिक चिल्लाता है,
कहाँ मर रहे हो
साहब को नमक दो |

नमक लेकर पहुँचता हूँ टेबल पर
न जाने क्यों घूरती हैं,
साहब के साथ आई मैडम की आँखें 
जब मैं पकड़ाता हूँ नमक अपने नन्हें, कमजोर, गंदे हाथों से

पैसे की मत पूछो साहब
जून की तपती दुपहरी में, जलता हूँ भट्टी के पास 
और धोता हूँ गिलास ठन्डे पानी से, दिसम्बर की सर्द रातों में 
नंगें पाँव दौड़ता हूँ दिन भर ताकि मिल सके दो जून की रोटी

भागकर कहाँ जाऊंगा ? क्या करूँगा ?
कहाँ सर छुपाऊंगा ? रोटी कहाँ से लाऊंगा ?
इस 12-13 साल की उम्र में,कैसे जी पाउँगा ?

नाम तो कुछ पता नहीं साहब,
बस सुबह से शाम तक 
'छोटू-छोटू' बुलाया जाता हूँ


-हिमांशु विद्रोही  

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