Saturday, 14 April 2018

'मैं किसान हूँ' 





दिसम्बर की सर्द रातों में,
आवारा पशुओं से डर के साये में 
नींद होती है आँखों में पर सो नहीं पाता हूँ,
होता हूँ भूखा भी पर खा नहीं पाता हूँ | 

थकान है पर आराम कहाँ ?

दिन भर खेतों को सींचता हूँ,
सोती है जब दुनियां मैं जगता हूँ | 
इस डर से कि कहीं घुस ना आये कोई आवारा पशु और 
चौपट न कर दे सारी फसल | 

चारों तरफ बाड़ लगाता हूँ दिन भर 
ताकि चैन से सो सकूँ रात में | 
देख कर सपने में, 
घुस आये आवारा पशु खेत में 
जग जाता हूँ कच्ची नींद में 
और सो नहीं पाता हूँ फिर सारी रात | 

दिन भर धुप में तपता हूँ और 
रात को सो नहीं पाता हूँ | 
हाथों में छाले हो गये हैं और फट गयी है पैर में बिवाई | 

खुश बस इस बात से हूँ कि 
फसल अच्छी है इस बार | 
बस कुछ दिन की परेशानी और है,
फसल कटने की ओर है | 
गेहूं की बालियाँ अच्छी हैं,
भाव अच्छा मिलेगा इस बार | 

फसल पककर तैयार है, 
घर में खुशियों की लहर है | 
कटने में अभी एक-दो  दिन की देर है | 

अचानक यह ओलावृष्टि कहाँ से हो गई ?
दाना-दाना बिखर गया है खेत की मिट्टी में | 

समझ नहीं पा रहा हूँ कि पहले रो लूँ या अनाज़ इक्क्ठा कर लूँ ?
एक दाना उठाता हूँ तो एक आंसूं टपक पड़ता है | 
दो दिन बीत चुके हैं पर बिखरा अनाज़ उठा नहीं पाया हूँ | 

नहीं-नहीं आंसूं अब सूख चुके हैं 
घर में फैली वो ख़ुशी अब काफ़ूर हो चुकी है | 
कुछ महीने बीत चुके हैं, 
फिर फसल बोने का वक़्त हो चला है | 

कुछ कर्ज लिया है बीज खरीदने को,
नहीं-नहीं पहले वाला चूका नहीं पाया हूँ | 
रख दिया हूँ पत्नी का बचा आखिरी गहना भी गिरवी | 

सोचा है इस बार खुद हल जोतूँगा,
ट्रेक्टर का पैसा नहीं है | 
अरे ! बैल.... बैल तो मर चुके हैं कब के,
चारे के अभाव में | 

नया कुछ नहीं है,
वही फिर से दोहराऊंगा | 
वो ही धुप में तपना, रात में जागना 
बिवाई का फटना, भूखे सो जाना | 

नहीं-नहीं गलत सोच रहे हैं आप | 
आत्महत्या नहीं करूँगा, 
'मैं किसान हूँ' साहब | 

भूखे सो जाऊंगा, सारे गम सह जाऊँगा 
पर हार नहीं मानूंगा | 
चीर कर सीना इस बंजर भूमि का, 
मैं फिर से बसंत ले आऊंगा | 

हिमांशु विद्रोही 
 

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