Wednesday, 21 February 2018

मैं सच हूँ


"मैं सच हूँ"

डराया डराने को
दबाया दबाने को
डराया, सताया और धमकाया |
ठहरा रहा हो निडर,
तो मार गिराया !

डराते- डराते इतना डर गये तुम स्वयं
छिपाने को डर अपना,
छलावे से छीन हथियार मेरा,
मुझे बाहर बिठाया |

डरते हो सच्चाई से
हो कायर भी तुम
साहस नहीं,
कि कर सको सामना सच का
बना हथियार किसी और को
पीछे से तीर चलाया |

सोचा था तुमने
डराओगे तो डर जाऊंगा,
सताओगे तो मर जाऊंगा |

पर मैं तो सच्चाई का बीज हूँ
जमीन में दबाओगे, तो अंकुरबन उग आऊंगा |

धुप में तपकर, बारिश में भीगकर
सर्दी में ठिठुरकर, आंधियों से लड़कर |
काबिल-ए-तारीफ़ पेड़एक दिन बन जाऊंगा |

घबराना मत, मेरी विशालता देखकर
कहीं ना मिले आसरा, तो चले आना |
मेरी छाँव भी शीतल होगी....
ठीक मेरे स्वभाव की तरह !
हिमांशु विद्रोही 


(विश्वविद्यालय की पत्रिका 'मनसा' संस्मरण २०१६ में तथा 'The Critical Mirror' News portal में प्रकाशित )  

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