Thursday, 26 March 2020

"पूनम"(परिचय नहीं बताऊंगा चूँकि मेरे अल्फ़ाज़ इस काबिल नहीं की इस नाम के लिये मेरे अहसासों को अल्फ़ाज़ों का रूप दे सकें) के जन्मदिन पर उसकी नाराजगी से बचने के लिये बहाने के रूप में लिखी चंद पंक्तियाँ | इसका कोई शीर्षक नहीं है | 


कलियों सी जो नाज़ुक हो,
जो फूलों सी महकती हो,
चाँद सा जिसका चेहरा हो,
जो बहती नदिया की धारा हो,
चढ़ते सूरज का जो कहर हो,
जो समुन्द्र में उठती लहर हो,
दुनिया जिसकी कायल हो,
मानो बाग़ में चहकती कोयल हो,
मानो संध्या की थकन हो,
लगती जो सुबह की ताजगी हो,
जैसे नभ गगन का तारा हो,
या आसमाँ में चाँद प्यारा हो,
मोहम्मद रफ़ी का गाना हो,
मानो लता जी का तराना हो
सावन का जैसा आना हो,
या मौसम कोई सुहाना हो,
कोई आखिरी बचा बहाना हो,
ढूंढता जिसे ज़माना हो,
जैसे हर सवाल का जवाब हो,
मानो विद्रोही का ख्वाब हो
तुम्हें बार बार जन्मदिन मुबारक हो !


- हिमांशु विद्रोही 

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