Thursday, 26 March 2020

अगर तुम कभी लौटकर आओ

गर तुम कभी लौटकर आओ,
तो पास जाकर पूछना मेरी मोहब्बत का किस्सा,
गली के आखरी छोर के बूढ़े दरखत से,
दरखत के नीचे लगी आधी टूटी पुरानी बेंच से,
वो सब बतायेंगें तुम्हें, मेरी मोहब्बत का किस्सा |


गर पूछ न सको तो सुनना,
पेड़ की डाल पर बैठी कोयल की आवाज़,
तालाब में तैरती बतख की आवाज़,
घोंसले में चहचहाती चिड़िया की आवाज़,
इन सब आवाज़ों में सुनाई देगा तुम्हें, मेरी मोहब्बत का किस्सा |


गर सुन ना सको तो पढ़ना,
दरख़तों के पत्तों पर,
दीवारों के इश्तिहारों पर,
शहर के हर मोड़ पर,
तुम्हें लिखा मिलेगा,  मेरी मोहब्बत का किस्सा |


गर पढ़ ना सको तो महसूस करना
औंस की बूंदों की छुअन में,
ठंडी हवा की छुअन में,
तेज धूप की किरणों में,
इन सब में तुम्हें महसूस होगा, मेरी मोहब्बत का किस्सा |


और गर महसूस भी ना कर सको,
तो बस शांत, मूक गुजरना
शहर की गलियों से,
पेड़ के पत्तों से,
कोयल के गीतों से,
पानी की कल-कल से,
हवा की सरसराहट से और
शहर के जर्रे-जर्रे से,
गूंजेगा, मेरी मोहब्बत का किस्सा |

गर तुम कभी लौटकर आओ...
- हिमांशु विद्रोही 

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