"जीया हो जिसके साथ जींदगी को,
उस से बिछड़ना आसान नहीं होता |
और रही होंगीं उनकी भी कुछ मजबूरियाँ मोहब्बत से भी बढ़कर,
वर्ना यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता !"
(...मेरी ख़ास मोहब्बत के नाम )
कुछ इस कदर यकीं था उसे मेरी मोहब्बत पर,
भरी हसीनाओं की महफ़िल में अकेला छोड़ जाया करती थी |
उसे ज़रा भी ख़ौफ़ न था मेरी मौत का,
हर बात पर कसम मेरी ही खाया करती थी |
कुछ यूँ बेहिसाब फ़िक्र थी उसे मेरी,
एक बार में फोन न उठाने पर बुरा मान जाया करती थी |
यूँ तो रूठ जाया करती थी वह वह छोटी-छोटी बातों पर,
पर मेरे प्यार मनाने पर मान जाया करती थी |
हक़ वह इस कदर जताया करती थी मुझ पर,
भरी सभा में भी मुझे जान कहकर बुलाया करती थी |
और मोहब्बत वह कुछ इस तरह निभाया करती थी,
जब भी बिछड़ती थी मुझ से, अपना एक दुप्पटा छोड़ जाया करती थी |
- हिमांशु विद्रोही
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