Thursday, 18 June 2020

"बहुत खुश हूँ आज बड़े दिनों बाद तुमसे बहुत दूर"

(कोरोना महामारी में बेरोजगार हुये मजदूरों के घर लौटने की स्थिति व् मनोदशा को मध्यनज़र रखकर लिखी गई कविता जिसका शीर्षक "बहुत खुश हूँ आज बड़े दिनों बाद तुमसे बहुत दूर" की रचना मेरी छोटी बहन 'रितु यादव' ने की है |) 

"बहुत खुश हूँ आज बड़े दिनों बाद तुमसे बहुत दूर"
 

नंगें पैर ही चल रहा हूँ अपने गाँव की ओर,
अपनी ही बनाई लम्बी सडकों पर
पर आज निकला हूँ बाहर पहली बार
तुम्हारी फैक्ट्रियों के ज़हरीले धुएं से कहीं दूर,
बहुत खुश हूँ आज बड़े दिनों बाद तुमसे बहुत दूर

खुश हूँ यह सोचकर कि मिलूंगा बीवी बच्चों से,
मालकिन की तीखी डांट ना खाकर सुनूंगा बीबी की मीठी आवाज
और सुनूंगा बच्चों कि किलकारियां इस शोर-शराबे से दूर
बहुत खुश हूँ आज बड़े दिनों बाद तुमसे बहुत दूर

वहाँ हम सब मालिक होंगे ,
अपने घरों मेँ अपनी बस्ती मेँ,
तुम्हारी गन्दी राजनीती और बिकाऊ मीडिया से कहीं परे,
लांछन भरी जिन्दगी से दूर ,
बहुत खुश हूँ आज बड़े दिनों बाद तुमसे बहुत दूर

हमें ही कुचलकर चली जाती है रेल तुम्हारी
हमारे ही बिछाई पटरियों पर
हम में से कुछ मर जाते हैं भूख के कहर से
तो कुछ मार दिए जाते हैं पुलिस की मार से
बहुत खुश हूँ आज बड़े दिनों बाद तुमसे बहुत दूर


अब नहीं मरेगा मेरा कोई साथी मशीनों मेँ फंसकर ,
और ना मरेगा कोई गंदे गटर के नाले मेँ गिरकर,
नहीं घुटेगा अब दम किसी का गेस रिसाव से,
और ना मरेगा कोई बेरोजगारी के दबाब से


अपनी दुनिया को जानूंगा मैं इसी संसार मेँ ,
उस दुनिया से परे जँहा मेरे काम को बस पैसों में तोला गया,
ना कभी सम्मान मिला, और ना मिली कभी इज्जत
पर बहुत खुश हूँ आज बड़े दिनों बाद तुमसे बहुत दूर ||


रितु यादव 

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