लड़कियां
लड़कियां, लड़कियां हां यही सब लड़कियां,जिन्हें देखते हैं हम सब आस पास,
और पाते हैं अकेले तो मारते हैं सिटीयां,
आखिर किस मिट्टी की बनी हुई हैं यह सब लड़कियां,
सुनकर भी सिटीयां सर झुका कर चली जाती हैं लड़कियां,
सास के ताने और पति की गालियां,
पिताजी की डांट और भाई की शैतानियां सब सह जाती हैं लड़कियां,
21वीं सदी में जी रही फिर भी बलात्कार की शिकार हैं लड़कियां,
कर के काम दिन भर खेत में भी शाम में खाना बनाती लड़कियां,
आखिर किस मिट्टी की बनी हुई हैं यह सब लड़कियां,
बाबा की इज्जत और मां का ख्वाब होती हैं यह लड़कियां,
फूल से भी नाजुक हाथों वाली पत्थर तोड़ती लड़कियां,
पढ़ने की उम्र में गोबर पाथती लड़कियां,
कड़कती ठंड में भी फसल उगाती लड़कियां,
यह इंकलाब लिखती JNU की लड़कियां,
यह मोहब्बत सिखाती 'जामिया' की लड़कियां,
संविधान बचाती शाहीन बाग की लड़कियां,
जन्नत के लिए लड़ रही कश्मीर की लड़कियां,
पुरूषवाद पर प्रहार करती शबरीमल्ला की लड़कियां,
यह देश बचाती BHU की लड़कियां,
कलियों सी नाज़ुक पत्थरों से टकरा रहीं हैं लड़कियां,
गाने लगी तो लता,
लिखने लगी तो महादेवी,
लड़ने लगीं तो लक्ष्मी बाई,
खेलने लगीं तो सानिया,
राजनीति में आई तो इंदिरा
जो भेजोगे अंतरिक्ष में तो कल्पना भी बन जाती हैं लड़कियां,
आखिर किस मिट्टी की बनी हुई हैं यह सब लड़कियां !
लड़कियां लड़कियां हां यही सब लड़कियां,
जिन्हें देखते हैं हम सब आस पास..............
- हिमांशु विद्रोही
nice guruji
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteबेहद शुक्रिया
Delete
ReplyDeleteThis is really a perfect poem which is written perfectly. you are an awsome poet, keep it up
I am hearty thankful to you for your kind attention and valuable feedback for my little try.
Delete