Wednesday, 8 April 2020

अब मैं उड़ना चाहती हूँ


(यह कविता तमाम उन लड़कियों को समर्पित है जिन्हें मोहब्बत में किसी से बेवफाई मिली है | यह केवल टूटे दिलों को एक नया मोड़ देने की कोशिश भर है | )


गये जो तुम मेरी जिंदगी से
हुई मुक्त तेरी बंदगी से



होकर मुक्त तुम्हारे बंधनों से
नील आसमान के नीचे
खली पड़ी जमीं पर
बेधड़क, बेख़ौफ़ दौड़ती हूँ
हाँ मैं अब भी सपने बुनती हूँ




मुझे आज भी याद है
वो तुम्हारा पहली नज़र देखना
पर भूली नहीं हूँ मैं
तुम्हारा मुझे छोड़कर जाना
हाँ मैं आज भी सपने देखती हूँ
पर खुली आँखों से




सुनहरे हैं सपने मेरे
अफ़सोस नहीं कि उनमें तुम नहीं
एक नया अहसास, नई ऊर्जा
नया अपनापन है इन सपनों में




भूली नहीं हूँ तुम्हारी पहली छुअन
पर अब मैं आसमां छूना चाहती हूँ
चाहती हूँ कि अब मैं मोहब्बत करूँ खुद से
सोचूं खुद के बारे में और प्यार करूँ खुद से

तुम अब भी मेरी यादों में हो

और तुम्हें बस वहीँ तक रखना चाहती हूँ
बहुत सताया है मैंने खुद को
अब मैं उड़ना चाहती हूँ
नीले आसमां के नीचे
खाली पड़ी जमीं पर
बेधड़क, बेख़ौफ़ दौड़ना चाहती हूँ


बुरा लगता है मुझे भी
याद भी आती है तुम्हारी
शायद प्यार भी है तुमसे
भूली नहीं तुम्हें
पर याद भी नहीं रखना चाहती


आगे मंज़िल और पीछे बस यादें
मुड़ गई अगर पीछे तो
डूब जाउंगी यादों के सागर में
डूब गई तो फिर याद आयेंगें

वो पहली नज़र, पहली छुअन
वो पहली मुस्कराहट, पहली चाहत
वो पहली धुप, पहली छाँव
पहली सुबह, पहली शाम
पहली रात, पहली बात
और वो सब जो हुआ पहली बार


कोई गम नहीं तुमसे बिछङकर
बस अब आगे बढ़ना चाहती हूँ
अब अपने लिये जीना चाहती हूँ



वो जो बताये थे ना राज तुमको
वो जो सुनाये थे ना किस्से तुमको
वो जो बताई थीं न बातें तुमको
वो जो सौंपीं थीं न रातें तुमको
उन सब को अब छुपाना चाहती हूँ



अब मैं उड़ना चाहती हूँ
नीले आसमां के नीचे
खाली पड़ी जमीं पर
बेधड़क, बेख़ौफ़ दौड़ना चाहती हूँ 

- हिमांशु विद्रोही 


5 comments:

  1. A real depiction of a broken heart !
    Wonderful.
    Keep it up 🤟

    ReplyDelete
  2. बहुत ही सुंदर और हृदय स्पर्शी पंक्तियाँ है भाईजी 👌... आपने सही कहा की..यादों का काफिला साथ लेकर भी सपने पूरे किये जा सकते...

    ReplyDelete

माथे पर बोसा

मेरे दायें हाथ में तुम्हारा बायां हाथ और मेरा बाया हाथ तुम्हारी कमर पर  इस तरह कसा हो कि  कसकर खींच सके तुम्हें इतना करीब कि तुम्हारी गर्म स...