Thursday, 16 September 2021

कुछ देर पास मेरे बैठा करो...

" काफी महिनों बाद अधपके और अधूरे प्रेम पर चंद पंक्तियाँ लिखने की नाकाम कोशिश"  ! 


कुछ देर पास मेरे बैठा करो,

कि तुम पर भी मैं कुछ लिखा करूँ

लिख दूँ पायल की छनछन

कैसे बयां करूं शब्दों में कंगन की खनखन को 

यही बैठकर सोचा करूँ


कुछ देर पास मेरे बैठा करो

कि तूम पर भी मैं कुछ लिखा करुं

लिख दूँ झुमके का तुम्हारे गालों को छूना, 

जुल्फों का हवा में लहराना

और मेरा बस एकटक तुम्हें देखना

तुम्हें देखता मुझे देखकर

वो तुम्हारा शर्मा के मुस्कुराना

कुछ देर पास मेरे बैठा करो

कि तुम पर भी मैं कुछ लिखा करूँ


लिखा करूँ माथे की बिंदिया की बातें

होठों की लाली का भी गुणगान करूं

कुछ देर पास मेरे बैठा करो

कि तुम भी मैं कुछ लिखा करूँ  !


- हिमांशु विद्रोही

1 comment:

  1. कविता के हर शब्द में दम है

    ReplyDelete

माथे पर बोसा

मेरे दायें हाथ में तुम्हारा बायां हाथ और मेरा बाया हाथ तुम्हारी कमर पर  इस तरह कसा हो कि  कसकर खींच सके तुम्हें इतना करीब कि तुम्हारी गर्म स...